भोपाल। मध्य प्रदेश के प्रसिद्ध पचमढ़ी अभयारण्य को अब एक नया नाम मिल गया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सोमवार को घोषणा की कि इसे अब ‘राजा भभूत सिंह पचमढ़ी अभयारण्य’ के नाम से जाना जाएगा। यह निर्णय राजा भभूत सिंह के पर्यावरण संरक्षण के प्रति समर्पण और विदेशी ताकतों से पचमढ़ी की रक्षा के उनके अथक प्रयासों को सम्मान देने के उद्देश्य से लिया गया है। मुख्यमंत्री ने कहा कि अभयारण्य में राजा भभूत सिंह के जीवन, संघर्ष, और योगदान से जुड़ी जानकारियों को प्रदर्शित किया जाएगा, जिससे स्थानीय गौरव को बढ़ावा मिलेगा और यह क्षेत्र ऐतिहासिक एवं प्राकृतिक विरासत का प्रतीक बनेगा। पचमढ़ी स्थित राजभवन में राज्य मंत्रि-परिषद की बैठक से पहले मुख्यमंत्री डॉ. यादव ने अपने संबोधन में इस फैसले की जानकारी दी। उन्होंने कहा कि राजा भभूत सिंह का आदिवासी समाज पर गहरा प्रभाव रहा है, और उनकी वीरता की गाथाएं आज भी लोकगीतों और भजनों में जीवंत हैं। इस बैठक को पचमढ़ी में आयोजित करने का उद्देश्य भी राजा भभूत सिंह के योगदान को समाज के सामने लाना है।
कौन थे राजा भभूत सिंह?
मुख्यमंत्री ने बताया कि राजा भभूत सिंह 1857 के स्वतंत्रता संग्राम के दौरान महान सेनानी तात्या टोपे के प्रमुख सहयोगी रहे। उनकी छापामार युद्ध नीति के चलते उन्हें नर्मदांचल का शिवाजी कहा जाता है। अंग्रेजों को उनसे निपटने के लिए मद्रास इन्फेंट्री बुलानी पड़ी। राजा भभूत सिंह 1860 तक अंग्रेजों से सशस्त्र संघर्ष करते रहे और आखिरकार उसी वर्ष उन्हें गिरफ्तार कर फांसी दे दी गई। उनकी वीरगाथाएं कोरकू समाज की लोक संस्कृति, गाँवों, मंदिरों और गीतों में आज भी जीवित हैं। अंग्रेज अधिकारी एलियट की 1865 की सेटलमेंट रिपोर्ट में भी उनका उल्लेख मिलता है। मुख्यमंत्री ने कहा कि राजा भभूत सिंह केवल एक योद्धा नहीं, बल्कि आदिवासी चेतना, देशभक्ति और आत्मसम्मान के प्रतीक हैं। उनके बलिदान को राष्ट्रीय मंच पर लाना हम सभी का नैतिक दायित्व है।
अन्य घोषणाएं
मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने यह भी बताया कि जून माह में राज्य सरकार तीन प्रमुख जनजातीय सम्मेलनों का आयोजन करेगी:
7 जून को डिण्डौरी के बजाग में बैगा सम्मेलन
9 जून को शहडोल के ब्यौहारी में कोल सम्मेलन (बिरसा मुण्डा जयंती पर)
18 जून को शिवपुरी के कोलारस में सहारिया सम्मेलन