पलपल इंडिया प्रतिनिधि,जबलपुर। आज से पितृपक्ष प्रारंभ हो गया है और आज के दिन पहला श्राद्ध हुआ नर्मदा के तट ग्वारीघाट में तर्पण करने वाले सुबह से ही पहुंचने लगे और वे अपने पितरों को घर लेकर आए नर्मदा तटों पर लोगों ने अपने पितरों का तर्पण किया हिंदू धर्म में ये समय अपने पूर्वजों को श्रद्धांजलि अर्पित करने के लिए विशेष महत्व रखता है। पितृपक्ष भाद्रपद मास की पूर्णिमा से शुरू होकर आश्विन मास की अमावस्या तक चलेगा
हिंदू धर्म के अनुसार, पितृपक्ष का समय अपने पूर्वजों की आत्मा की शांति और उनके उद्धार के लिए होता है, जो मृत्यु के बाद पितृलोक में निवास करते हैं। धार्मिक मान्यतानुसार, इस समय किए गए श्राद्ध कर्म, तर्पण और पिंडदान से पूर्वजों की आत्माओं को संतोष प्राप्त होता है, जिससे वे अपने वंशजों को आशीर्वाद प्रदान करते है। ये भी मान्यता है कि पितृपक्ष के दौरान पितर धरती पर आते हैं और अपनी संतानों से संतोष पाकर उन्हें आशीर्वाद देते हैं।
पितृपक्ष के दौरान श्राद्ध कर्म का विशेष महत्व होता है। श्राद्ध कर्म में पूर्वजों को तिल, जल, गाय का दूध, घी और सफेद वस्त्र अर्पित किए जाते हैं। साथ ही, पिंडदान किया जाता है जो कि चावल और तिल से बनाए गए गोलाकार पिंड होते हैं। जल तर्पण के माध्यम से पितरों को जल अर्पित किया जाता है। इसका उद्देश्य पूर्वजों की आत्मा को शांति और मुक्ति प्रदान करना होता है।
श्राद्ध कर्म करने के लिए श्राद्ध तिथि का निर्धारण जन्म तिथि और मृत्यु तिथि के आधार पर किया जाता है। जिनकी मृत्यु किस विशेष तिथि पर होती है, उसी दिन उनका श्राद्ध किया जाता है। इस वर्ष पितृपक्ष का पहला श्राद्ध 18 सितंबर 2024, बुधवार को हुआ इस दिन प्रतिपदा श्राद्ध किया गया, जिसे ‘पड़वा श्राद्ध’ के नाम से भी जाना जाता है। पितृपक्ष का समापन 2 अक्टूबर को आश्विन अमावस्या के दिन होगा।
पितृपक्ष की कुल 15 तिथियों में प्रत्येक का अपना विशेष महत्व होता है। पहला श्राद्ध, जिसे प्रतिपदा श्राद्ध कहा जाता है, उन पितरों के लिए किया जाता है, जिनकी मृत्यु किसी भी माह की प्रतिपदा तिथि को हुई हो। इसके साथ ही, यदि किसी के नाना-नानी के श्राद्ध करने के लिए उनके परिवार में कोई नहीं है तो प्रतिपदा तिथि पर उनका भी श्राद्ध किया जा सकता है, चाहे उनकी मृत्यु किसी भी तिथि पर हुई हो।
HIGHLIGHTS