पलपल इंडिया प्रतिनिधि,जबलपुर। सुप्रीम कोर्ट की पांच जजों की पीठ ने 4:1 के बहुमत से ये फैसला सुनाया है। कोर्ट ने नागरिकता कानून की धारा 6ए की वैधता को बरकरार रखा है। इस फैसले के मुताबिक जनवरी 1966 से पहले बांग्लादेश से असम में आए लोग भारतीय नागरिक बने रहेंगे। वहीं, 1966 से 1971 की बीच आए बांग्लादेशी भारतीय नागरिकता के लिए आवेदन कर सकेंगे। असम में बड़ी संख्या में बांग्लादेश से आए लोग रहते हैं।
चीफ जस्टिस डीवाई चंद्रचूड़ की अगुवाई वाली बेंच में जस्टिस सूर्यकांत, जस्टिस एमएम सुरेश, जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस मनोज मिश्रा शामिल थे. बेंच के एकमात्र जज जस्टिस जेबी पारदीवाला ने ही धारा 6A को असंवैधानिक माना है.
धारा 6A, जिसे 1985 के असम समझौते पर हस्ताक्षर के बाद नागरिकता अधिनियम 1955 में शामिल किया गया था। सुनवाई के दौरान CJI डीवाई चंद्रचूड़ का कहना था कि 6A उन लोगों को नागरिकता प्रदान करता है, जो संवैधानिक प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आते हैं और ठोस प्रावधानों के अंतर्गत नहीं आते हैं।
बहुमत से फैसला सुनाते हुए सुप्रीम कोर्ट ने कहा, बांग्लादेश के साथ सीमा साझा करने वाले राज्यों में से असम को अलग तरह से देखना सही था क्योंकि यहां की स्थानीय आबादी में अप्रवासियों का प्रतिशत ज्यादा है। पश्चिम बंगाल में 57 लाख अप्रवासी हैं, जबकि असम में 40 लाख अप्रवासी बसे हैं। फिर भी असम की कम आबादी को देखते हुए ऐसा करना सही था, क्योंकि बंगाल की तुलना में असम का जमीनी इलाका काफी कम है। कोर्ट ने माना कि 25 मार्च 1971 की कट-ऑफ डेट लगाना सही था।
1979 में असम से अवैध प्रवासियों को बाहर निकालने की मांग को लेकर ऑल असम स्टूडेंट्स यूनियन (AASU) ने आंदोलन शुरू किया। लगभग छह साल तक चले आंदोलन के बाद 1985 में एक समझौता हुआ, जिसे ‘असम अकॉर्ड’ कहा जाता है।
इस कानून में असम समझौते द्वारा कवर किए गए व्यक्तियों की नागरिकता के संबंध में विशेष प्रावधान के रूप में संदर्भित किया गया है। प्रावधान के अनुसार, जो लोग 1 जनवरी, 1966 को या उसके बाद 25 मार्च, 1971 से पहले बांग्लादेश सहित कई क्षेत्रों से असम आए थे। तब से वह असम के निवासी हैं। उन्हें अब नागरिकता के लिए धारा 18 के तहत खुद को पंजीकृत करना होगा।
धारा 6A के मुताबिक, 1 जनवरी 1966 से पहले बांग्लादेश से आए भारतीय मूल के व्यक्तियों को ही भारतीय नागरिक माना जाएगा। वहीं, जो लोग 1 जनवरी 1966 से 24 मार्च 1971 के बीच आए होंगे, उन्हें अपना रजिस्ट्रेशन करवाना होगा और कम से कम 10 साल असम में रहने के बाद भारतीय नागरिकता मांग सकेंगे। हालांकि, इस दौरान वो वोट नहीं डाल सकते। जबकि, 25 मार्च 1971 के बाद आए लोगों की पहचान की जाएगी और उन्हें कानूनी रूप से निर्वासित किया जाएगा यानी वापस भेजा जाएगा।
‘असम संमिलिता महासंघ’ नाम के सिविल सोसायटी ग्रुप ने सबसे पहले साल 2012 में धारा 6A को भेदभावपूर्ण, मनमाना और गैरकानूनी मानते हुए विरोध किया। क्योंकि इसमें असम और शेष भारत में प्रवेश करने वाले अवैध प्रवासियों को नियमित करने के लिए अलग-अलग कट-ऑफ तारीख प्रदान की गई हैं।
इस धारा को संविधान के अनुच्छेद 6 के आधार पर भी चुनौती दी गई. अनुच्छेद 6 कहता है कि जो कोई भी 19 जुलाई 1948 से पहले पाकिस्तान से भारत आया होगा, उसे नागरिकता दी जाएगी। लेकिन धारा 6A जोड़कर असम के लिए ये कट-ऑफ डेट 1 जनवरी 1966 तय कर दी गई। याचिका में दलील दी गई कि इससे असम में अवैध प्रवासियों को बढ़वा दिया जायेगा।
सुप्रीम कोर्ट में बहुमत के फैसले में कहा गया कि असम में प्रवेश करने और नागरिकता प्रदान करने के लिए 25 मार्च, 1971 की कट-ऑफ तारीख सही थी। हालांकि, जज जेबी पारदीवाला ने असहमति जताई और धारा 6ए को असंवैधानिक करार दिया। उन्होंने कहा कि जाली दस्तावेजों के आगमन के कारण धारा 6ए की खुली प्रकृति का दुरुपयोग होने की संभावना अधिक हो गई है।