पलपल इंडिया प्रतिनधि। इंसान की जब मृत्यु होती है तो उसकी मुक्ति के लिए मुक्तिधाम ले जाकर दाह संस्कार किया जाता है। जिसे अंतिम संस्कार भी कहा जाता है लेकिन मृत्यु के बाद भी मुक्ति के लिए शरीर को इंतजार करना पड़ रहा है। जिसका मुख्य कारण यह है कि देवास के एकमात्र मुक्तिधाम में लकड़ियां गीली है और दाह संस्कार करने वालों को गीली लकड़ियों के चलते इंतजार करना पड़ता है। दरअसल हम बात कर रहे हैं देवास के मुक्तिधाम की। जहां मृत्यु के बाद अंतिम संस्कार किया जाता है।देवास शहर की आबादी लगभग 3 लाख से अधिक है। रोजाना एक से अधिक लोगों का अंतिम संस्कार मुक्तिधाम में किया जाता है।
नगर निगम द्वारा संचालित मुक्तिधाम में ₹500 प्रति क्विंटल लकड़ी के लिए जाते हैं। वहीं 9 रुपए का एक कंडा दिया जाता है। लकड़ी गीली होने के चलते ज्यादा लकड़ियां लगती है।साथ ही शरीर के जलने में लंबा इंतजार करना पड़ता है। अब बात करें कंडे की तो टेंडर के हिसाब से ₹9 का एक कंडा है और लगभग 2 किलो वजन है। लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि एक कंडा ज्यादा से ज्यादा 1 किलो का और कम से कम 600 ग्राम तक का निकल रहा है। मुक्तिधाम में हो रहे इस तरह के लकड़ी और कंडे के मामले को लेकर साफ प्रतीत होता है कि नगर निगम के अधिकारियों की मिली भगत है।
शव के अंतिम संस्कार के लिए करीब ढाई से तीन कुंटल लकड़ी और करीब 250 से अधिक कंडे का उपयोग होता है। कंडे के वजन को लेकर जब हकीकत जानी तो तोल कांटे पर कोई कंडा 1 किलो से कम और कोई डेढ़ किलो के अंदर निकला जिससे साफ नजर आ रहा है कि मृत्यु के बाद भी अंतिम संस्कार के लिए भी मृतक के परिजनों को नगर निगम के अधिकारियों की मिली भगत से लूटा जा रहा है। कम से कम अंतिम संस्कार के लिए तो जिम्मेदारों को ईमानदारी बरते हुए मृतक के परिजनों को राहत देना चाहिए।
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