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‘क्या बोलेंगे. घर में रहता था, तो दिन भर में 3-4 बार खाना माँगता था. अब इतने घंटे हो गए. कौन जाने, सुरंग में खाना मिल भी रहा है या नहीं. सुने हैं कि खाना-पानी भेजा गया है. मिला है कि नहीं. खाया है कि नहीं.”
“ये कैसे जानेंगे हम. भगवान मेरे बेटे को सुरंग से ज़िंदा बाहर निकाल दें. प्रधानमंत्री झारखंड आए हैं, तो मेरे बेटे को बचा लीजिए. सब लोग सुरंग से जल्दी बाहर आ जाएं. बस यही चाहते हैं.’
उत्तरकाशी में एक निर्माणाधीन सुरंग में फँसे एक मज़दूर, राजेंद्र बेदिया की माँ फूल कुमारी देवी इतना ही बोल पाती हैं.
20 साल का राजेंद्र उनका इकलौता बेटा है. वो उन 40 मज़दूरों में से एक हैं, जो उस सुरंग के अंदर फँस गए हैं.
वे अपने गाँव खीराबेड़ा के कुछ साथियों के साथ इसी महीने उत्तरकाशी के उस प्रोजेक्ट में काम करने गए थे.