कृष्ण जन्मभूमि या शाही ईदगाह भूमि केस में फैसला आज, हिंदू-मुस्लिम पक्ष की याचिकाओं पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला क्या होगा

By: PalPal India News
August 1, 2024

पलपल इंडिया प्रतिनिधि। मथुरा के श्रीकृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट आज अपना फैसला सुनाएगा. सूत्रों के मुताबिक कोर्ट का फैसला 2 बजे तक आने की उम्मीद है  इलाहाबाद हाईकोर्ट आज मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि-शाही ईदगाह मस्जिद विवाद के संबंध में दायर मुकदमों को चुनौती देने वाली याचिका पर फैसला सुनाएगी. हम आपको बता दे की हिंदू पक्ष की तरफ से दाखिल 18 याचिकाओं के खिलाफ शाही ईदगाह कमेटी ने हाईकोर्ट में सीपीसी के ऑर्डर 7, रूल 11 के तहत चुनौती दी है.

दोनों पक्षों ने अपनी अपनी याचिकाएं दायर की है जिनमें  हिंदू पक्ष ने जो याचिकाएं दायर की हैं, उनमें शाही ईदगाह मस्जिद की जमीन को हिंदुओं की बताया है और वहां पूजा का अधिकार दिए जाने की मांग की है. वहीं, मुस्लिम पक्ष ने प्लेसिस ऑफ वर्शिप एक्ट, वक्फ एक्ट, लिमिटेशन एक्ट और स्पेसिफिक पजेशन रिलीफ एक्ट का हवाला दिया और हिंदू पक्ष की याचिकाओं को खारिज किए जाने की दलील पेश की है.

हिंदू पक्ष ने याचिकाओं में दावा किया है कि मस्जिद का निर्माण कटरा केशव देव मंदिर की 13.37 एकड़ भूमि पर किया गया है. हिन्दू पक्ष ने ये भी दावा किया है की औरंगजेब के जमाने की मस्जिद, मंदिर के विध्वंस के बाद बनाई गई है. अब देखना यह है की इलाहाबाद हाईकोर्ट क्या फैसला करता है.

जानिए दोनों पक्षों की दलीले

हिंदू पक्षकारों की दलीलें हैं कि…
  1.  ईदगाह का पूरा ढाई एकड़ का एरिया भगवान श्रीकृष्ण विराजमान का गर्भगृह है.
  2. मंदिर तोड़कर मस्जिद का अवैध निर्माण किया गया है
  3. जमीन का स्वामित्व कटरा केशव देव का है.
  4. मस्जिद कमेटी के पास भूमि का कोई ऐसा रिकॉर्ड नहीं है.
  5. सीपीसी का आदेश-7, नियम-11 इस याचिका में लागू ही नहीं होता है.
  6. वक्फ बोर्ड ने बिना किसी वैध प्रक्रिया के इस भूमि को वक्फ संपत्ति घोषित कर दिया है.
  7. भवन पुरातत्व विभाग से भी संरक्षित घोषित है, इसलिए भी इसमें उपासना स्थल अधिनियम लागू नहीं होता.
मुस्लिम पक्षकारों की दलीलें हैं कि…
  1.  इस जमीन पर दोनों पक्षों के बीच 1968 में समझौता हुआ है. 60 साल बाद समझौते को गलत बताना ठीक नहीं. लिहाजा, मुकदमा चलने योग्य ही नहीं है.
  2. उपासना स्थल कानून यानी प्लेसेज ऑफ वर्शिप एक्ट 1991 के तहत भी मुकदमा सुनवाई योग्य नहीं है.
  3.  15 अगस्त 1947 के दिन जिस धार्मिक स्थल की पहचान और प्रकृति जैसी है वैसी ही बनी रहेगी. यानी उसकी प्रकृति नहीं बदली जा सकती.
  4.  लिमिटेशन एक्ट और वक्फ अधिनियम के तहत भी इस मामले को देखा जाए.
  5.  इस विवाद की सुनवाई वक्फ ट्रिब्यूनल में हो. यह सिविल कोर्ट में सुना जाने वाला मामला है ही नहीं.

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