पलपल इंडिया प्रतिनधि। बैकुंठ चतुर्दशी की मध्य रात्रि को बांदकपुर धाम में भगवान जागेश्वर नाथ ने सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंपा। परंपरानुसार हरि-भगवान विष्णु की प्रतिमा को हर भगवान जागेश्वर नाथ के सम्मुख विराजमान किया गया। इस अद्भुत दृश्य के दर्शनों के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुंचे। रात करीब 12 बजे भगवान जागेश्वर नाथ मंदिर के कपाट खोले गए। पूजन आरती के बाद यहां भगवान जागेश्वर नाथ ने सृष्टि का भार भगवान विष्णु को सौंपने की परंपरा का निर्वहन किया। यह परंपरा हरि- यानी भगवान विष्णु की पीतल की प्रतिमा हर यानी स्वयंभू दिव्य शिवलिंग जागेश्वर नाथ महादेव के सम्मुख विराजमान की गई। जिसको हरि-हर मिलन कहते हैं। पौराणिक मान्यता के अनुसार, देवशयनी एकादशी से देवउठनी एकादशी तक जगत के पालनकर्ता भगवान विष्णु राजा बलि के यहां पाताल लोक में विश्राम करने जाते हैं। इसलिए चार महीने तक संपूर्ण सृष्टि के पालन का भार भगवान शिव के पास होता है।
जागेश्वर नाथ महादेव मंदिर बांदकपुर के पुजारी दुर्गेश सीतू पंडा ने बताया जागेश्वर नाथ महादेव मंदिर में कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी यानि बैकुंठ चतुर्दशी भगवान विष्णु (हरि) और शिवजी (हर) के मिलन का प्रतीक है। मंदिर के गर्भगृह में रात 12 बजे यहां स्वयंभू दिव्य शिवलिंग भगवान शिव जी, भगवान विष्णु जी प्रतिमा सामने आसीन होते हैं और हरि-हर मिलन के प्रतीक इस परंपरा का निर्वहन किया जाता है। मंदिर पद्धति से पूजन किया जाता है। शिवजी के प्रिय बिल्वपत्र और आक भगवान विष्णु दोनों की प्रिय वस्तुओं का एक-दूसरे को भोग लगाया जाता है। इसके बाद मान्यता है भगवान शिव चार महीने के लिए तपस्या करने चले जाते हैं। उज्जैन महाकाल मंदिर की तर्ज पर बांदकपुर मंदिर भी परंपरा निभाई जाती है।
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