पलपल इंडिया प्रतिनिधि। अमेरिका के नए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा फैसला लिया है. उन्होंने अपने देश को दुनिया के एक बहुत बड़े स्वास्थ्य संगठन, विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) से अलग कर दिया है. अमेरिका ने डब्ल्यूएचओ से अपना नाम वापस ले लिया है. लेकिन आखिर क्यूँ इतना बड़ा फैसला किया ट्रम्प ने यह सवाल आपके मन में भी उठ रहा होगा तो आईये जानते है की आखिर क्या वजह हो सकती है इसकी….
ट्रंप ने WHO पर कोविड-19 को ठीक से नहीं संभालने और चीन के प्रति पक्षपाती होने का आरोप लगाया है. उन्होंने कहा कि अमेरिका डब्ल्यूएचओ को बहुत अधिक धन देता है, जबकि चीन कम. राष्ट्रपति पद की शपथ लेने के लगभग आठ घंटे बाद जारी किए गए एक कार्यकारी आदेश में डोनाल्ड ट्रंप ने अमेरिका के हटने के कई कारण बताए हैं. उनका कहना कि डब्ल्यूएचओ कोविड-19 महामारी से ठीक तरीके से नहीं निपट सका था. ट्रंप ने यह भी आरोप लगाया है कि वो तत्काल आवश्यक सुधारों को अपनाने में सफल नहीं रहा. उन्होंने यह भी कहा कि अमेरिका डब्ल्यूएचओ को चलाने के लिए बहुत ज्यादा पैसे देता है, जबकि चीन जैसे देश कम पैसे देते हैं.
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि डोनाल्ड ट्रंप का यह कदम वैश्विक नेता के रूप में देश की प्रतिष्ठा को कमजोर करेगा. इसके अलावा अमेरिका का अगली महामारी से लड़ना कठिन हो जाएगा. हालांकि डोनाल्ड ट्रंप का यह कदम अप्रत्याशित नहीं था. ट्रंप 2020 से ही डब्ल्यूएचओ के खिलाफ आवाज उठा रहे हैं. उन्होंने पहले भी कोरोना वायरस महामारी को लेकर एजेंसी के नजरिये पर हमला किया था और उसे अमेरिका से मिलने वाली फंडिंग रोकने की धमकी दी थी. जुलाई 2020 में ट्रंप ने एजेंसी से हटने के लिए औपचारिक कदम उठाए थे. लेकिन 2020 का चुनाव हारने के कारण यह धमकी पूरी नहीं हुई. 20 जनवरी, 2021 को अपने पहले दिन, पूर्व राष्ट्रपति जो बाइडन ने इसे लागू होने से रोक दिया.
अमेरिका को क्या होगा नुकसान?
इस फैसले से अमेरिका को कई नुकसान हो सकते है क्योंकि डब्ल्यूएचओ दुनिया भर में बीमारियों के बारे में बहुत सारी जानकारी रखता है. अमेरिका अब इस जानकारी से वंचित रह जाएगा. वहीं, डब्ल्यूएचओ दुनिया भर में बीमारियों से लड़ने में मदद करता है. अमेरिका के जाने से डब्ल्यूएचओ को कम पैसा मिलेगा और वह कम काम कर पाएगा. इससे दुनिया भर में बीमारियां फैलने का खतरा बढ़ सकता है. जैसे चीन ने 2020 में कोरोना वायरस के आनुवंशिक सिक्वेसिंग की डब्ल्यूएचओ को जानकारी दी थी. तब डब्ल्यूएचओ ने इसे अन्य देशों के साथ साझा किया था.