मुंबई। महाराष्ट्र में लागू की जा रही तीन भाषा नीति (थ्री लैंग्वेज पॉलिसी) को लेकर उठे तीव्र विरोध के चलते राज्य सरकार को आखिरकार पीछे हटना पड़ा है। विपक्ष के दबाव और जनभावनाओं को देखते हुए सरकार ने इससे जुड़े पुराने सरकारी आदेश (जीआर) को रद्द कर दिया है और अब इस नीति की दोबारा समीक्षा के लिए एक नई समिति का गठन किया जाएगा।
शिवसेना (उद्धव बालासाहेब ठाकरे) प्रमुख उद्धव ठाकरे ने इस फैसले को मराठी जनता की एकजुटता की जीत बताया। उन्होंने कहा,
“सरकार को यह अंदाज़ा नहीं था कि मराठी मानुष इतनी मजबूती से खड़ा हो जाएगा। जनता के विरोध के सामने उन्हें पीछे हटना ही पड़ा।”
मीडिया से बातचीत में उन्होंने सीधे मुख्यमंत्री पर सवाल उठाते हुए कहा,
“मुख्यमंत्री मराठी भाषा को क्यों दरकिनार करना चाहते हैं? क्या हिंदी को ज़बरदस्ती थोपना उनकी नीति का हिस्सा है? क्या यह कहना गलत होगा कि वे मराठी भाषा के विरोध में हैं?”
उद्धव ठाकरे ने यह भी आरोप लगाया कि सरकार किसानों की समस्याएं, बेरोजगारी और महंगाई जैसे असल मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भाषा नीति जैसे फैसलों को सामने ला रही है।
महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना (मनसे) के प्रमुख राज ठाकरे ने सरकार के इस यू-टर्न पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा,
“यह कोई समझदारी से लिया गया फैसला नहीं है, बल्कि मराठी जनता के भारी विरोध का सीधा असर है।”
उन्होंने यह सवाल भी उठाया कि सरकार हिंदी थोपने के लिए इतने अड़ियल रुख पर क्यों थी और इसके पीछे कौन-सी शक्तियां थीं – यह अब भी स्पष्ट नहीं है।
राज ठाकरे ने चेतावनी देते हुए कहा कि चाहे समिति की रिपोर्ट आए या न आए, अब इस तरह की कोई भी कोशिश महाराष्ट्र में बर्दाश्त नहीं की जाएगी।